(1) राज्य सरकार किसी वन अधिकारी को निम्नलिखित सभी या सभी शक्तियां प्रदान कर सकेगी, अर्थात्:-
(क) किसी भूमि पर प्रवेश करने तथा उसका सर्वेक्षण करने, सीमांकन करने तथा मानचित्र बनाने की शक्ति;
(ख) गवाहों को उपस्थित कराने तथा दस्तावेज और भौतिक वस्तुएं प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने की सिविल न्यायालय की शक्तियां;
(ग) दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का ​​5) के अधीन तलाशी वारंट जारी करने की शक्ति; और
(घ) वन-अपराधों की जांच करने की शक्ति, तथा ऐसी जांच के दौरान साक्ष्य प्राप्त करने और अभिलिखित करने की शक्ति।
(2) उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन अभिलिखित कोई साक्ष्य मजिस्ट्रेट के समक्ष पश्चातवर्ती परीक्षण में ग्राह्य होगा, बशर्ते कि वह अभियुक्त व्यक्ति की उपस्थिति में लिया गया हो।
सभी वन अधिकारी भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) के अर्थ में लोक सेवक माने जाएंगे।
इस अधिनियम के अंतर्गत किसी लोक सेवक द्वारा सद्भावपूर्वक किए गए किसी कार्य के लिए उसके विरुद्ध कोई वाद नहीं लाया जाएगा।
राज्य सरकार की लिखित अनुमति के बिना, कोई भी वन अधिकारी, प्रधान या अभिकर्ता के रूप में, इमारती लकड़ी या अन्य वन उपज का व्यापार नहीं करेगा, या किसी वन के पट्टे में या किसी वन पर कार्य करने की किसी संविदा में हितबद्ध नहीं होगा या नहीं बनेगा, चाहे वह उन राज्यक्षेत्रों के भीतर हो या बाहर जिन पर यह अधिनियम लागू होता है।
पेज अद्यतन तिथि: 10-09-2025 04:50 PM