(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी वन या बंजर भूमि में वनों की कटाई को विनियमित या प्रतिषिद्ध कर सकेगी।
(क) खेती के लिए भूमि को तोड़ना या साफ करना;
(ख) मवेशियों को चराना; या
(ग) वनस्पति को जलाना या साफ करना;
जब ऐसा विनियमन या निषेध निम्नलिखित में से किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक प्रतीत होता है:-
(i) तूफान, हवा, लुढ़कते पत्थरों, बाढ़ और हिमस्खलन से सुरक्षा के लिए;
(ii) पर्वतीय क्षेत्रों की चोटियों और ढलानों तथा घाटियों में मृदा के संरक्षण के लिए, भूमि के खिसकने या खड्डों और धाराओं के निर्माण को रोकने के लिए, या भूमि को कटाव या उस पर रेत, पत्थर या बजरी के जमाव से बचाने के लिए;
(iii) झरनों, नदियों और तालाबों में जल आपूर्ति के रखरखाव के लिए;
(iv) सड़कों, पुलों, रेलवे और संचार की अन्य लाइनों की सुरक्षा के लिए;
(v) सार्वजनिक स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए
(2) राज्य सरकार, ऐसे किसी प्रयोजन के लिए, अपने व्यय पर किसी वन या बंजर भूमि में या उस पर ऐसा निर्माण करा सकेगी, जैसा वह ठीक समझे।
(3) उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना तब तक नहीं की जाएगी और न ही उपधारा (2) के अधीन कोई कार्य आरंभ किया जाएगा, जब तक ऐसे वन या भूमि के स्वामी को नोटिस जारी न कर दिया जाए, जिसमें उससे ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट की जाने वाली उचित अवधि के भीतर कारण बताने को कहा जाए कि, यथास्थिति, ऐसी अधिसूचना क्यों न की जाए या कार्य क्यों न निर्मित किया जाए, और जब तक उसकी आपत्तियों, यदि कोई हों, और उसके समर्थन में उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए किसी साक्ष्य की उस निमित्त सम्यक् रूप से नियुक्त अधिकारी द्वारा सुनवाई न कर ली जाए और राज्य सरकार द्वारा उन पर विचार न कर लिया जाए।
(1) धारा 35 के अधीन किसी विनियम या प्रतिषेध की उपेक्षा या जानबूझकर अवज्ञा की दशा में, या यदि उस धारा के अधीन निर्मित किए जाने वाले किसी संकर्म के प्रयोजनों के लिए ऐसा अपेक्षित हो, तो राज्य सरकार, ऐसे वन या भूमि के स्वामी को लिखित सूचना देने के पश्चात् और उसकी आपत्तियों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात् उसे वन अधिकारी के नियंत्रण में रख सकेगी और घोषित कर सकेगी कि आरक्षित वनों से संबंधित इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध ऐसे वन या भूमि पर लागू होंगे।
(2) ऐसे वन या भूमि के प्रबंधन से उत्पन्न शुद्ध लाभ, यदि कोई हो, उक्त स्वामी को दिया जाएगा।
(1) इस अध्याय के अधीन किसी मामले में, जिसमें राज्य सरकार यह समझती है कि वन या भूमि को वन अधिकारी के नियंत्रण में रखने के बदले उसे लोक प्रयोजनों के लिए अर्जित किया जाना चाहिए, राज्य सरकार भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) द्वारा उपबंधित रीति से उसे अर्जित करने के लिए कार्यवाही कर सकेगी।
(2) धारा 35 के अधीन किसी अधिसूचना में सम्मिलित किसी वन या भूमि का स्वामी, उसकी तारीख से कम से कम तीन या अधिक से अधिक बारह वर्ष के भीतर किसी भी समय यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसे वन या भूमि का अधिग्रहण लोक प्रयोजनों के लिए किया जाएगा और राज्य सरकार तद्नुसार ऐसे वन या भूमि की अपेक्षा करेगी।
(1) किसी भूमि का स्वामी या यदि उसके एक से अधिक स्वामी हों तो उसमें कुल मिलाकर कम से कम दो-तिहाई हिस्से के स्वामी, उस पर वनों के निर्माण या संरक्षण की दृष्टि से कलेक्टर को लिखित रूप में अपनी इच्छा प्रस्तुत कर सकेंगे।
(क) ऐसी भूमि का प्रबंधन वन अधिकारी द्वारा उनकी ओर से आरक्षित या संरक्षित वन के रूप में ऐसी शर्तों पर किया जाएगा, जिन पर पारस्परिक सहमति हो; या
(ख) इस अधिनियम के सभी या कोई भी प्रावधान ऐसी भूमि पर लागू किए जाएं।
(2) किसी भी मामले में, राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी भूमि पर इस अधिनियम के ऐसे उपबंध लागू कर सकेगी, जिन्हें वह उसकी परिस्थितियों के लिए उपयुक्त समझे और जो आवेदक चाहें।
पेज अद्यतन तिथि: 10-09-2025 05:17 PM