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(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अध्याय के उपबंधों को किसी वन-भूमि या बंजर-भूमि पर लागू घोषित कर सकेगी, जो आरक्षित वन में सम्मिलित नहीं है, किन्तु जो सरकार की संपत्ति है, या जिस पर सरकार के स्वामित्व अधिकार हैं, या सम्पूर्ण वन-उपज या उसके किसी भाग पर, जिस पर सरकार हकदार है।

(2) ऐसी किसी अधिसूचना में सम्मिलित वन-भूमि और बंजर-भूमि को "संरक्षित वन" कहा जाएगा।

(3) ऐसी कोई अधिसूचना तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक कि उसमें सम्मिलित वन-भूमि या बंजर-भूमि में या उस पर सरकार और निजी व्यक्तियों के अधिकारों की प्रकृति और सीमा की जाँच न कर ली जाए और सर्वेक्षण या बंदोबस्त में या ऐसी अन्य रीति से, जिसे राज्य सरकार पर्याप्त समझे, अभिलिखित न कर ली जाए। ऐसा प्रत्येक अभिलेख तब तक सही माना जाएगा जब तक कि प्रतिकूल साबित न हो जाए:

परन्तु यदि किसी वन-भूमि या बंजर भूमि के मामले में राज्य सरकार यह समझती है कि ऐसी जांच और अभिलेख आवश्यक हैं, किन्तु उनमें इतना समय लगेगा कि इस बीच सरकार के अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे, तो राज्य सरकार ऐसी जांच और अभिलेख लंबित रहने तक ऐसी भूमि को संरक्षित वन घोषित कर सकेगी, किन्तु इस प्रकार कि इससे व्यक्तियों या समुदायों के किसी विद्यमान अधिकार में कमी या प्रभाव न पड़े।

राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,

(क) किसी संरक्षित वन में किसी वृक्ष या वृक्षों के वर्ग को अधिसूचना द्वारा निर्धारित तिथि से आरक्षित घोषित कर सकेगी;
(ख) यह घोषित कर सकेगी कि अधिसूचना में विनिर्दिष्ट ऐसे वन का कोई भाग तीस वर्ष से अधिक की ऐसी अवधि के लिए बंद रहेगा, जैसा राज्य सरकार ठीक समझे, और ऐसे भाग पर निजी व्यक्तियों के अधिकार, यदि कोई हों, ऐसी अवधि के दौरान निलंबित रहेंगे, बशर्ते कि ऐसे वन का शेष भाग पर्याप्त हो, और ऐसे बंद भाग में निलंबित अधिकार के सम्यक् प्रयोग के लिए उचित रूप से सुविधाजनक स्थान पर हो; या
(ग) पूर्वोक्त रूप से निर्धारित तिथि से, ऐसे किसी वन में पत्थर का उत्खनन, या चूने या लकड़ी का कोयला जलाना, या किसी वन-उपज का संग्रहण या किसी विनिर्माण प्रक्रिया के अधीन करना, या हटाना, और ऐसे किसी वन में किसी भूमि को खेती, भवन निर्माण, पशुपालन या किसी अन्य प्रयोजन के लिए तोड़ना या साफ करना।

निर्णय :

 
  • उच्च न्यायालय के निर्णय

     

कलेक्टर धारा 30 के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना का स्थानीय भाषा में अनुवाद कराएगा और अधिसूचना में सम्मिलित वन के पड़ोस में स्थित प्रत्येक नगर और गांव में किसी सहजदृश्य स्थान पर चिपकाएगा।

निर्णय :

 
  • उच्च न्यायालय के निर्णय

     

राज्य सरकार निम्नलिखित मामलों को विनियमित करने के लिए नियम बना सकती है, अर्थात्:
(क) संरक्षित वनों से पेड़ों और इमारती लकड़ी को काटना, काटना, परिवर्तित करना और हटाना, तथा वन-उपज का संग्रह, निर्माण और हटाना;
(ख) संरक्षित वनों के आसपास के शहरों और गांवों के निवासियों को अपने उपयोग के लिए पेड़, इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज लेने के लिए लाइसेंस देना, और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसे लाइसेंसों का उत्पादन और वापसी;
(ग) व्यापार के प्रयोजनों के लिए ऐसे जंगलों से पेड़ों या इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज को गिराने या हटाने वाले व्यक्तियों को लाइसेंस देना, और
(घ) ऐसे पेड़ों को काटने, या ऐसी इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज को इकट्ठा करने और हटाने की अनुमति के लिए खंड (ख) और (ग) में उल्लिखित व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले भुगतान, यदि कोई हों; (
ङ) ऐसे पेड़ों, इमारती लकड़ी और उपज के संबंध में उनके द्वारा किए जाने वाले अन्य भुगतान, यदि कोई हों, और वे स्थान जहां ऐसा भुगतान किया जाएगा;
(च) ऐसे वनों से निकलने वाले वन-उपज की जांच;
(छ) ऐसे वनों में खेती या अन्य प्रयोजनों के लिए भूमि को साफ करना और तोड़ना;
(ज) ऐसे वनों में पड़ी हुई लकड़ी और धारा 30 के अधीन आरक्षित वृक्षों को आग से बचाना;
(झ) ऐसे वनों में घास काटना और मवेशियों को चराना;
(ञ) ऐसे वनों में शिकार करना, गोली मारना, मछली पकड़ना, जल में विष डालना और जाल या फंदे लगाना तथा ऐसे वनों में हाथियों को मारना या पकड़ना, जहां हाथी संरक्षण अधिनियम, 1879 (1879 का 6) लागू नहीं है;
(ट) धारा 30 के अधीन बंद किए गए वन के किसी भाग का संरक्षण और प्रबंधन; और
(ठ) धारा 29 में निर्दिष्ट अधिकारों का प्रयोग।

(1) कोई भी व्यक्ति जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई भी अपराध करता है, अर्थात्:
(क) धारा 30 के तहत आरक्षित किसी भी पेड़ को गिराता है, घेरता है, काटता है, टैप करता है या जलाता है, या छाल या पत्तियों को उतारता है, या अन्यथा किसी ऐसे पेड़ को नुकसान पहुंचाता है;
(ख) धारा 30 के तहत किसी भी निषेध के विपरीत, किसी भी पत्थर को खोदता है, या किसी भी चूने या लकड़ी का कोयला जलाता है या इकट्ठा करता है, किसी भी विनिर्माण प्रक्रिया के अधीन करता है, या किसी भी वन-उपज को हटाता है;
(ग) धारा 30 के तहत किसी भी निषेध के विपरीत, खेती या किसी अन्य उद्देश्य के लिए किसी भी संरक्षित जंगल में किसी भी भूमि को तोड़ता है या साफ करता है;
(घ) ऐसे जंगल में आग लगाता है, या धारा 30 के तहत आरक्षित किसी भी पेड़ तक फैलने से रोकने के लिए सभी उचित सावधानियां बरते बिना आग जलाता है, चाहे वह गिरा हुआ हो या गिरा हुआ हो, या ऐसे जंगल का बंद हिस्सा कहें;
(ङ) किसी भी ऐसे पेड़ या बंद हिस्से के आसपास के क्षेत्र में उसके द्वारा जलाई गई किसी भी आग को जलता छोड़ देता है;
(च) किसी भी पेड़ को गिराता है या किसी भी लकड़ी को खींचता है जिससे पूर्वोक्त रूप से आरक्षित किसी भी पेड़ को नुकसान पहुंचे;
(छ) मवेशियों को ऐसे किसी वृक्ष को नुकसान पहुंचाने की अनुमति देगा;
(ज) धारा 32 के अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा।

(2) जब कभी किसी संरक्षित वन में जानबूझकर या घोर उपेक्षा से आग लगाई जाती है, तब राज्य सरकार, इस धारा के अधीन कोई शास्ति दिए जाने के बावजूद, निदेश दे सकेगी कि ऐसे वन या उसके किसी भाग में चरागाह या वन-उपज के किसी अधिकार का प्रयोग ऐसी अवधि के लिए निलंबित कर दिया जाएगा, जितनी वह ठीक समझे।

निर्णय :

 
  • उच्च न्यायालय के निर्णय

     

इस अध्याय की कोई बात वन अधिकारी की लिखित अनुज्ञा से या धारा 32 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार किए गए किसी कार्य को प्रतिषिद्ध करने वाली नहीं समझी जाएगी, या धारा 30 के अधीन बंद किए गए वन के किसी भाग के संबंध में या धारा 29 के अधीन अभिलिखित किसी अधिकार के प्रयोग में धारा 33 के अधीन निलम्बित किए गए किसी अधिकार के संबंध में किए गए किसी कार्य को प्रतिषिद्ध करने वाली नहीं समझी जाएगी।

पेज अद्यतन तिथि: 10-09-2025 05:15 PM

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